बाह्य सेवा-deputation service क्या है

 बाह्य सेवा-deputation service पर प्रतिनियुक्ति की शर्तें 

उत्तर प्रदेश सरकार के शासनादेश संख्‍या जी-1/दस-82-534(46)-76, दिनांक 14-12-1982 के अनुसार सार्वजनिक उपक्रमों, निगमों, स्‍थानीय निकायों आदि में सरकारी सेवकों की बाह्य सेवा-deputation service पर प्रतिनियुक्ति निम्‍न शर्तो के साथ की जायेगी:-
  • किसी भी सरकारी सेवक को सामान्‍यतया 5 वर्ष से अधिक की अवधि के लिए वाहय सेवा पर स्‍थानान्‍तरित न किया जाये। यदि विशेष परिस्थितियों में 5 वर्ष के बाद भी वाहय सेवा पर रखना आवश्‍यक हो तो स्‍पष्‍ट कारणों सहित प्रशासकीय विभाग द्वारा ऐसे प्रस्‍ताव वित्‍त विभाग को भेजे जायें। परन्‍तु शासनादेश संख्‍या जी-1-176/दस-99-534(46)/76 टी0सी0, दिनांक 16 मार्च, 99 के प्रस्‍तर-2 के अनुसार ”सरकारी सेवकों के निगमों आदि में प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने की सामान्‍य अवधि 03 वर्ष बनाये रखी जा सकती हैं किन्‍तु 06 वर्ष के उपरान्‍तर किसी भी दशा में प्रतिनियुक्ति अवधि को न बढाया जाये”। 
  • दूसरी बार वाहय सेवा पर स्‍थानान्‍तरित करने के पूर्व यह सुनिश्चित किया जाये कि बीच में उसने कम से कम पैतृक विभाग में 2 वर्ष तक की सेवा कर ली हो। शासनादेश संख्‍या सा-1-205/दस-97-534(46)-76, दिनांक 8 अप्रैल 1997 के प्रस्‍तर-1 के बिन्‍दु-1 के अनुसार ”किसी भी सरकारी सेवक को जो वाहय सेवा पर एक बार स्‍थानान्‍तरिक किया जा चुका हैं उसे दूसरी बार वाहय सेवा पर स्‍थानान्‍तरित करने से पूर्व पैतृक विभाग में बीच की सेवा अ‍वधि कम से कम दो वर्ष होगी, परन्‍तु उक्‍त दो वर्ष की अवधि को विशेष परिस्थितियों में गुणावगुण के आधार पर छ:माह तक रखने का अधिकार प्रशासकीय विभाग में प्रतिनिहित किया जाता हैं परन्‍तु इससे कम अवधि के लिए वित्‍त विभाग की सहमति आवश्‍यक होगी।
  1. प्रतिनियुक्ति पर आये किसी सरकारी सेवक को अपनी संख्‍या/संगठन में नियमित रूप से संविलियन करना चाहें, तो उस सरकारी सेवक का सम्‍बन्धित संस्‍था में समविलियन वित्‍त विभाग की सहमति से सार्वजनिक उद्यम विभाग द्वारा जारी किये गये मार्गदर्शन सिद्धान्‍त के अनुसार होगा।
  2. शासनादेश संख्‍या सा-3-13/दस-97-925/803 दिनांक 6 जनवरी, 1997 के अनुसार 55 वर्ष की आयु से अधिक के सरकारी सेवक प्रतिनियुक्ति पर नहीं भेजे जायेंगे। यदि इन्‍हें भेजा जाना नितान्‍त आवश्‍यक हैं तो प्रशासनिक विभाग वित्‍त विभाग की पूर्व सहमति प्राप्‍त करेंगे।

बाह्य सेवा-deputation service के मुख्‍य नियम

             वित्‍तीय नियम संग्रह खण्‍ड-2 भाग 2 से 4 के मूल नियम-9 (7) में बाह्य सेवा-deputation service को परिभाषित किया गया हैं और इसके अनुसार वाहय सेवा का तात्‍पर्य वह सेवा हैं जिसमें सरकारी सेवक अपना वेतन शासन की स्‍वीकृति से केन्‍द्रीय अथवा राज्‍य सरकार अथवा सरकार के परिषद के राजस्‍व के अतिरिक्‍त अन्‍य स्रोतों से प्रापत करता हैं। उदाहरणार्थ, शासन के विभिन्‍न निगमों, विश्‍वविद्यालयों, स्‍थानीय निकायों, विकास प्राधिकरणों आदि में सरकारी सेवक वाहय सेवा पर भेजे जा सकते हैं। वाहय सेवा से सम्‍बन्धित नियम वित्‍तीय हस्‍त पुस्तिका खण्‍ड 2 भाग- 2 से 4 के अध्‍याय- 12 के अन्‍तर्गत मूल नियम- 110 से 127 तक तथा सहायक नियम 185, 186 तथा 206 से 208 में दिये हुये हैं।

बाह्य सेवा-deputation service से सम्‍बन्धित मुख्‍य मूल नियम निम्‍न हैं:

  • शासन के पूर्ण अथवा आंशिक रूप से स्‍वामित्‍व अथवा नियंत्रण में आने वाले निकायों को छोडकर किसी भी सरकारी कर्मचारी को उसकी इच्‍छा के विरूद्ध बाह्य सेवा-deputation service में स्‍थानान्‍तरित नहीं किया जा सकता हैं। भारत वर्ष के बाहर किसी सरकारी कर्मचारी को बाह्य सेवा में भेजने हेतु शासन की स्‍वीकृति आवश्‍यक हैं। भारत में भी सरकारी कर्मचारी को बाह्य सेवा में स्‍थानान्‍तरण के लिए शासन की स्‍वीकृति अपेक्षित हैं, परन्‍तु कतिपय मामलों में भारत वर्ष के अन्‍दर बाह्य सेवा में स्‍थानान्‍तरण का अधिकार अधीनस्‍थ अधिकारियों को प्रतिनिधानित कर दिया गया हैं। अराजपत्रित कर्मचारियों को राज्य के बाहर अथवा भारत में बाहर सेवा पर विभागाध्‍यक्ष द्वारा भेजा जा सकता है।                        मूल नियम 110
  • वाहय सेवा में स्‍थानान्‍तरण तब तक अनुमन्‍य नहीं हैं जब तक कि स्‍थानान्‍तरण के पश्‍चात् की जाने वाली ड्यूटी ऐसी न हो जो जनहित में सरकारी कर्मचारी द्वारा ही की जानी आवश्‍यक हो एवं साथ ही साथ सम्‍बन्धित सरकारी सेवकों का स्‍थायी पद पर लियन भी हो।  मूल नियम 111
  • मूल नियम 111-के नीचे दिये गये राज्‍यपाल के आदेश के अनुसार एक अस्‍थायी सरकारी सेवक को भी वाहय सेवा पर भेजा जा सकता हैं। यदि सरकारी सेवक की सेवायें किसी निजी कम्‍पनी को दी जाने हो तो इस नियम (मूल नियम 111) के सिद्धान्‍त को अत्‍यन्‍त कठोरता से लागू किया जाना चाहिये।
  • यदि कोई सरकारी सेवक अवकाश पर हैं और अवकाश पर रहते हुये ही उसे वाहय सेवा में स्‍थानान्‍तरित कर दिया जाता हैं तो इस स्‍थानान्‍तरण की तिथि से उसका अवकाश में रहना तथा अवकाश वेतन पाना समाप्‍त हो जाता है।                                              मूल नियम 112
  • वाहय सेवा मे स्‍थानान्‍तरित/सरकारी सेवक उस संवर्ग/सेवा में बना रहेगा जिसमें वह स्‍थानान्‍तरण से पूर्व स्‍थायी/अस्‍थायी रूप से कार्यरत रहा हैं। पैतृक विभाग में देय प्रोन्‍नतियों का लाभ भी उसे देय होगा।                                                                          मूल नियम 113

प्रतिनियुक्ति हेतु जारी मानक श‍र्ते निम्‍न हैं:-

1.     वेतन: बाह्य सेवा-deputation service की अवधि में सरकारी सेवक को अपने पैतृक विभाग में समय-समय पर अनुमन्‍य वेतनमान में वही वेतन देय होता हैं जो वह अपने पैतृक विभाग में पाता हो। शासनादेश संख्‍या सा-1-374/दस-99-4/99, दिनांक 3 जून 1999 के अनुसार उसी स्‍टेशन पर तैनाती की दशा में मूल वेतन का 5 प्रतिशत (अधिकतम रू0 500/- प्रतिमाह), यदि तैनाती स्‍टेशन के बाहर वाहय सेवा पर प्रतिनियुक्ति होता हैं तो वेतन का 10 प्रतिशत परन्‍तु अधिकतम, रू0 1000/- प्रतिमाह प्रतिनियुक्ति भत्‍ता इस शर्त के अधीन अनुमन्‍य होगा कि मूल वेतन तथा प्रतिनियुक्ति भत्‍ता का योग किसी भी समय रू0 22000/- प्रतिमाह से अधिक नहीं होगा। स्‍वेच्‍छा से दूसरे संगठन में वाहय सेवा पर स्‍थानान्‍तरित होता हैं तो उसे किसी भी दशा में किसी प्रकार का प्रतिनियुक्ति भत्‍ता अनुमन्‍य न होगा। नवीर दरें दिनांक 1 जून, 1999 से प्रभावी होगी।

2.    मंहगाई भत्‍ता: सरकारी सेवक को राज्‍य सरकार की दरों पर समय’-समय पर अनुमन्‍य महंगाई भत्‍ता देय होगा, परन्‍तु यह मंहगाई भत्‍ता केवल मूल वेतन पर दिया जायेगा एवं प्रतिनियुक्ति भत्‍ते को मंहगाई भत्‍ता की गणना हेतु सम्मिलित नहीं किया जायेगा।

3.    नगर प्रतिकर भत्‍ता: नगर प्रतिकर भत्‍ते का विनियमन वाहय सेवायोजनक के नियमों के अधीन किया जायेगा।

4.    मकान किराया भत्‍ता: मकान किराया भत्‍ता का विनियमन वाहय सेवायोजक के नियमों के अधीन किया जायेगा। सरकारी आवास का किराया फ्लैट रेन्‍ट की दुगनी दर पर लिया जायेगा। बिना किराये के मकान की सुविधा नहीं दी जायेगी।

5.    यात्रा भत्‍ता: बाह्य सेवा की अवधि में एवं वाहय सेवायोजन की अधीन पद पर कार्यभार ग्रहण करने तथा उससे प्रत्‍यावर्तन के समय की गई यात्राओं के लिये यात्रा भत्‍ता सरकारी सेवक के विकल्‍प के अनुसार या तो उसके पैतृक विभाग के नियम के अनुसार देय होगा अथवा वाहय सेवायोजनक के नियम के अनुसार, परन्‍तु इनका भुगतान वाहय सेवायोजन द्वारा ही किया जायेगा।

6.    भविष्‍य निधि: बाह्य सेवा की अवधि में सरकारी सेवक राज्‍य सरकार के भविष्‍य निधि नियमों द्वारा नियंत्रित होंगे। बाह्य सेवायोजक को चाहिये कि वह सरकारी सेवक के वेतन से भविष्‍य निधि का अभिदान काट ले तथा उसे ट्रेजरी चालान के माध्‍यम से सरकारी कोष में उपयुक्‍त लेखा शीर्षक के अन्‍तर्गत जमा कर दें। प्रदेश के बाहर बाह्य सेवा-deputation service पर कार्यरत सरकारी सेवकों के मामले में बैंक ड्राफ्ट के माध्‍यम से भविष्‍य निधि की धनराशि पैतृक विभाग में लेखाधिकारी (जिसके द्वारा भविष्‍य निधि का लेखा रखा जाता हैं) को भेज दिया जाना चाहिये।

7.    चिकित्‍सा सुविधाऐं: राज्‍य सरकार के अधीन उनको प्राप्‍त सुविधाओं से किसी प्रकार भी निम्‍नतर नहीं होगी। वाहय सेवायोजनक द्वारा चिकित्‍सा भत्‍ता देय नहीं होगा।

8.    अवकाश वेतन तथा अवकाश अवधि में प्रतिकर भत्‍ता: अवकाश वेतन उसके पैतृक विभाग द्वारा देय होगा। मंहगाई भत्‍ता तथा प्रतिकर भत्‍तों का पूरा वाहय सेवायोजनक द्वारा वहन किया जायेगा।

9.    अन्‍य वित्‍तीय सुविधायें: बिना शासन की सहमति के देय नहीं होगी।

10.      कार्यभार ग्रहरण करने के समय का वेतन और कार्यभार छोडने के समय का वेतन दोनों का ही विनियमन राज्य सरकार के नियमों के अधीन किया जायेगा और इसका भुगतान बाह्य सेवायोजनक द्वारा किया जायेगा। यह प्रक्रिया बाह्य सेवा-deputation service पर स्‍थानान्‍तरण के समय लिये जाने वाले कार्यभार ग्रहण काल एवं बाह्य सेवा से प्रत्‍यावर्तन के समय लिये जाने वाले कार्यभार ग्रहणकाल दोनों के लिए लागू होगी।

11.    अवकाश वेतन तथा पेंशन सम्‍बन्‍धी अंशदान: वित्‍तीय हस्‍त पुस्तिका खण्‍ड-2, भाग- 2 से 4 के मूल नियम 115 एवं 116 के अधीन शासन द्वारा समय-स3य पर निर्धारित दरों के अनुसार अवकाश वेतन का अंशदान तथा पेंशन के लिए अंशदान दोनों का ही भुगतान सरकारी सेवक अथवा वाहय सेवायोजनक द्वारा जैसी भी स्थिति हो किया जायेगा। राज्‍य सरकार के अधिकारियों/कर्मचारियों द्वारा वाहय सेवा की अवधि में पेंशनरी/अवकाश वेतन अंशदान आदि का भुगतान शासनादेश संख्‍या सा-1-1460/दस-534(38)/22 दिनांक 30 नवम्‍बर, 1988 में उल्लिखित लेखा शीर्षकों में जमा किया जायेगा। अधिकारियों द्वारा प्रतिनियुक्ति के समय अपना अवकाश वेतन अंशदान एवं पेंशन अंशदान निम्‍न लेखा शीर्षकों में जमा किया जाना चाहिए।

अवकाश वेतन अंशदान  (उत्तराखंड राज्य के लिए लेखाशीर्षक)

0070    :    अन्‍य प्रशासिनक सेवायें 60    :    अन्‍य सेवायें 800    :    अन्‍य प्राप्तियॉं 17    :    अवकाश वेतन अंशदान

पेंशन अंशदान     0070 : पेंशन तथा अन्‍य सेवानिवृत्ति लाभों के सम्‍बन्‍ध में अंशदान की वसूली 01 :  सिविल 101 :  अभिदान और अंशदान 05     :  प्रतिनियुक्ति पर गये सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों का पेंशन के लिये अंशदान चालान में अंशदान की अवधि तथा प्रतिनियुक्ति के पद का विवरण अनिवार्य रूप से अंकित किया जाना चाहिए।

       आवश्‍यक अंशदानों का भुगतान वार्षिक आधार पर किया जायेगा। इसे विलम्‍बतम 15 अप्रैल तक किया जाना होगा। समय से जमा न कराने पर अंशदानों पर रू0 100 पर 2 पैसा प्रतिदिन की दर से ब्‍याज भी देना होगा। सहायक नियम 185

अवकाश वेतन अंशदान पर अवकाश वेतन से सम्‍बन्धित अंशदान की नवीनतम शासनादेश जी-1-98/दस-534(1)/93, दिनांक 26-2-94 द्वारा निर्धारित की गई हैं और इसके अनुसार वर्तमान मूल वेतन का 11 प्रतिशत की धनराशि अवकाश वेतन अंशदान के रूप में देय होगी।

पेंशन अंशदान की दर- पेंशन से सम्‍बन्धित अंशदान की दरें वर्तमान शासनादेश संख्‍या जी-1-2700/दस(10)/82, दिनांक 15-12-82 द्वारा निर्धारित की गयी हैं। पेंशन अंशदान सेवा अवधि तथा अनुमन्‍य वेतनमान के अधिकतम पर आगणित किया जाता हैं।

पेंशन अंशदान की मासिक दर (वेतनमान के अधिकतम का प्रतिशत में)

सेवा अवधि (वर्ष में)

श्रेणी (क)

श्रेणी (ख)

श्रेणी (ग)

श्रेणी (घ)

0-1

7

6

5

4

1-2

7

6

6

4

2-3

8

7

6

5

3-4

8

7

7

5

4-5

9

8

7

5

5-6

10

8

7

6

6-7

10

9

8

6

7-8

11

9

8

6

8-9

11

10

9

7

9-10

12

10

9

7

10-11

12

11

10

7

11-12

13

11

10

8

12-13

14

12

10

8

13-14

14

12

11

8

14-15

15

13

11

9

15-16

15

13

12

9

16-17

16

14

12

9

17-18

16

14

13

10

18-19

17

15

13

10

19-20

17

15

13

10

20-21

18

16

14

11

21-22

19

16

14

11

22-23

19

17

15

11

23-24

20

17

15

12

24-25

20

17

16

12

25-26

21

18

16

12

26-27

21

18

16

13

27-28

22

19

17

13

28-29

23

19

17

13

29-30

23

20

18

13

30 वर्ष से अधिक

23

20

18

14

 

12-    अवकाश यात्रा सुविधा: शासन के नियमों के अनुसार बशर्ते बाह्य  सेवायोजक इसका पूरा व्‍यय वहन करेगा।

13-    सामूहिक बीमा योजना:  बाह्य सेवा पर गये सरकारी सेवक द्वारा इस योजना के अधीन भुगतान वाहय सेवा की अवधि में निरन्‍तर किया जाता रहेगा। सामान्‍य भविष्‍य निधि की भॉति इसकी कटौती भी वेतन से करते हुए ट्रेजरी चालान के माध्‍यम से जमा करायी जायेगी।

14-    भारत के बाहर बाह्य सेवा: वाहय सेवा पर पेंशन का अंशदान सम्‍बन्धित सरकारी सेवक को स्‍वयं जमा करना होगा। भुगतान की गयी धनराशि वह अपने वाहय सेवायोजक से ले सकता हैं। अवकाश वेतन का अंशदान जमा नहीं करना पडता हैं क्‍योंकि वह भारत के बाहर कोई अवकाश भी अर्जित नहीं करता हैं। इस अवधि में अवकाश लेखे से कोई अवकाश घटाया भी नहीं जाता हैं। प्रतिनियुक्ति भत्‍ता देय नहीं होता।

What is Civil Service Regulations 1972

What is Civil Service Regulations 1972 

Civil Service Regulations 1972 में सिविल सरकारी कर्मचारियों की सेवा की शर्तों के सभी पहलुओं जैसे वेतन, भत्ते, अवकाश और पेंशन शामिल थे, तब से पेंशन के अलावा अन्य सभी पहलुओं के संबंध में अलग-अलग नियमों ने अपना स्थान ले लिया है। इसके अलावा, राज्य सरकारों ने बाद में प्राप्त विधायी शक्तियों के अंतर्गत पेंशन से संबंधित कई प्रावधानों को अपने तरीके से अपनाया और संशोधित किया है। वर्तमान में केवल पेंशन से संबंधित प्रावधान शामिल हैं जैसा कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य में लागू है। उत्तराखंड राज्य द्वारा वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद Civil Service Regulations में कोई परिवर्तन नहीं किया है और पूर्व राज्य की भांति सभी नियमों व Civil Service Regulations को उसी रूप में स्वीकारा है।

Civil Service Rules

What is Power Delegation Financial Handbook Volume-1

What is Power Delegation Financial Handbook Volume-1

वित्तीय अधिकारों का प्रतिनिधायन
वित्तीय अधिकारों का प्रतिनिधायन उत्तराखंड राज्य

अधिकारों का प्रतिनिधायन

सामान्य

1       शासन के अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 154 के अंतर्गत और उसके उपबन्धों के अधीन रहते हुए शासन के अधीनस्थ किसी अधिकारी को उस सीमा तक और ऐसे प्रतिबंधों के साथ, जिन्हें शासन लगाना आवश्यक समझे, अथवा जो संविधान या शासन के नियमों अथवा आदेशों या राज्य विधान मंडल के किसी अधिनियम के उपबन्धों द्वारा पहले से ही लगाये गये हों, प्रतिनिहित किये जा सकते हैं। वे शर्तें और प्रतिबन्ध, जिनके अधीन ऐसे अधिकार प्रतिनिहित किये जायें, प्रतिनिहित करने के आदेशों अथवा नियमों में निर्दिष्ट कर देने चाहिए।

2       प्रतिनिहित अधिकार का प्रयोग उपर्युक्त प्रस्तर 3.1 में उल्लिखित शर्तों और प्रतिबन्धों के अधीन और सामान्य नियमों तथा समय-समय पर शासन द्वारा जारी किये गये विशेष निर्देशों के अनुपालन में किया जायेगा। सभी मामलों में, शासकीय धन का किसी प्रकार का व्यय करने से पूर्व अथवा उसका किसी भी प्रयोजन के लिए किसी भी व्यक्ति को भुगतान करने अथवा अग्रिम देने से पूर्व निम्नलिखित मूलभूत शर्तें अवश्य पूरी की जानी चाहिए, अर्थात :

(1) उक्त व्यय की वास्तव में जनहित में आवश्यकता हो।

(2) उक्त व्यय वास्तविक मांग से अधिक नहीं होना चाहिए।

(3) उक्त व्यय करने की अथवा धन का भुगतान करने अथवा अग्रिम देने की विशिष्ट स्वीकृति अथवा प्राधिकार हो,

(4) व्यय करने का अथवा भुगतान करने या अग्रिम देने का प्राधिकार अथवा उसकी स्वीकृति तब तक प्रयोग में नहीं लायी जायेगी, जब तक कि उस व्यय को पूरा करने के लिए अपेक्षित निधियां बजट मैनुअल में दिये हुए नियमों के अनुसार सक्षम प्राधिकारी द्वारा विनियोजित न कर ली गयी हो, और

(5) वित्तीय औचित्य के निर्धारित मापदण्डों में से (जो बजट मैनुअल में उद्धघृत किये गये है) किसी का उल्लंघन न होता हो।

टिप्पणी- ऐसे मामलों में जिनमें कोई विशिष्ट वित्तीय प्रतिनिधायन किसी अधिकारी को प्रतिनिहित किया गया हो, तो उसी विषय पर किया गया सामान्य वित्तीय प्रतिनिधायन, यदि कोई हो, लागू नहीं होगा।

3    वित्तीय नियम बनाने का अधिकार शासन के वित्त विभाग के अतिरिक्त किसी भी विभाग को प्रतिनिहित नहीं किया जा सकता है।

4    वित्तीय अधिकार केवल वित्त विभाग की अनुमति से ही प्रतिनिहित किये जा सकते हैं।

5    किसी प्राधिकारी को प्रतिनिहित किये गये वित्तीय अधिकार, वित्त विभाग की विशिष्ट स्वीकृति के बिना उस प्राधिकारी द्वारा किसी अधीनस्थ प्राधिकारी को पुनः प्रतिनिहित नहीं किये जायेंगे।

6     प्रस्तर 3.1 के अधीन शासन द्वारा किये गये प्रतिनिधान इस अध्याय के अगले खण्डों में दिये गये हैं और उनका सविस्तार वर्णन इस नियम संग्रह के भाग-2 में दिये हुए विवरण पत्रों में किया गया है। किन्तु इस नियम सग्रह में सम्पूर्ण प्रतिनिधानों का उल्लेख नहीं है। वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-11 खण्ड-1 खण्ड-V, खण्ड-VI एवं खण्ड-VII, बजट मैनुअल एवं अन्य विभागीय मैनुअलों में दिये हुए नियमों के अधीन किये गये प्रतिनिधान उन नियमों से सम्बन्धित सलग्न सूचियों में दिये हुए है। कतिपय वित्तीय अधिकारों के प्रतिनिधान वित्तीय नियम संग्रह के अन्य खण्डों के नियमों में भी दिये हुए हैं।

7    ऊपरिउल्लिखित प्रतिनिधानों के अलावा कोई अधीनस्थ प्राधिकारी उन सब मामलों में शासन के अधिकारों का प्रयोग कर सकता है, जिसमें कि उसे संविधान के उपबन्धों, उसके अधीन बने नियमों, संविधान के अधीन शासन द्वारा जारी किये गये आदेशों अथवा तत्समय प्रवृत्त विधान गण्डल द्वारा पारित अधिनियम अथवा किसी ऐसे अधिनियम के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा प्राधिकृत किया गया है।

तथापि इस पैरा के अधीन किसी अधीनस्थ प्राधिकारी को शासन की स्वीकृति के बिना ऐसा व्यय करने का अथवा ऐसा व्यय करने को प्राधिकृत करने का अधिकार नहीं प्राप्त होगा, जिसमें कि किसी नये सिद्धान्त, नीति अथवा प्रथा या ‘नयी सेवा पर, जैसा कि बजट मैनुअल में परिभाषित है, व्यय अन्तर्निहित हो।

खण्ड-II
आकस्मिक और अन्य प्रकीर्ण व्यय करने के अधिकार

8    आकस्मिक तथा अन्य प्रकीर्ण मामलों पर व्यय करने के सम्बना में अधीनस्थ प्राधिकारियों को प्रतिनिहित किये अधिकार इस संग्रह के भाग-2 में दिये गये विवरण पत्र-1 में सूचीबद्ध  किये गये हैं।

टिप्पणी – आकस्मिक और अन्य प्रकीर्ण व्यय के सम्बन्ध में आहरण-वितरण अधिकारियों को स्वीकृत अनुदान व्यय करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है, किन्तु शर्त यह है कि इस प्रयोजन के लिए निर्धारित धनराशि में वृद्धि न होने पाये और वह धनराशि केवल उन्हीं निर्धारित मदों पर व्यय की जाये जो कि आकस्मिक और अन्य प्रकीर्ण व्यय के नामें डाली जा सकती हो। 

Leave Rules अवकाश नियम व शर्तें

Leave Rules अवकाश नियम व शर्तें

अवकाश नियमों को सरलता प्रदान करने के लिये, अवकाशों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहली श्रेणी में वे अवकाश रखे जा सकते हैं जो मूलतः वित्तीय हस्त पुस्तिका खण्ड-दो (भाग 2 से 4) में वर्णित मूल एवं सहायक नियमों से संचालित होते हैं, तथा द्वितीय श्रेणी में वे अवकाश जो भिन्न प्रकार के हैं, यथा आकस्मिक अवकाश।

  1. वित्तीय हस्त पुस्तिका खण्ड-दो (भाग 2 से 4) के नियमों में उल्लिखित (विभिन्न अवकाश:-
1अर्जित अवकाश
Earned Leave – (EL)
2चिकित्सा अवकाशLeave on Medical Certificate (ML)
3मातृत्व अवकाशMaternity Leave (Mt. L)
4अध्ययन अवकाशStudy Leave (SL)
5असाधारण अवकाशExtra Ordinary Leave (OL)
6हास्पिटल अवकाशHospital Leave (HL)
7निजी कार्य पर अवकाशLeave on private affairs
8विशेष विकलांगता अवकाशSpecial Disability Leave
9लघुकृत अवकाशCommuted Leave

1- अर्जित अवकाश (Earned Leave)

अर्जित अवकाश स्थायी तथा अस्थायी दोनों प्रकार के सरकारी सेवकों द्वारा समान रुप से अर्जित किया जाता है, तथा समान शर्तो के अधीन उन्हें स्वीकृत किया जाता है। मूल नियम 81-ख (1) सहायक नियम 157-क (1)

अवकाश अवधि व अर्जित अवकाश की प्रक्रिया- Leave Rules-अवकाश नियम

  1. सरकारी सेवक के अर्जित अवकाश लेखों में पहली जनवरी को 16 दिन तथा पहली जुलाई को 15 दिन जमा किया जायेगा।
  2. अवकाश का हिसाब लगाते समय दिन के किसी अंश को निकटतम दिन पर पूर्णाकित किया जाता है, ताकि अवकाश का हिसाब पूरे दिन के आधार पर रहे।
  3. किसी एक समय जमा अवकाश का अवशेष शासनादेश संख्याः सा-4-392/ दस-94-203-86, दिनांकः 1, जुलाई 1999 के अनुसार सरकारी सेवकों के अवकाश खाते में अर्जित अवकाश जमा करने की अधिकतम सीमा 300 दिन कर दी गयी है।
  4. नियुक्ति होने पर प्रथम छःमाही में सेवा के प्रत्येक पूर्ण कैलेण्डर मास के लिए 2-1/2 (ढाई) दिन प्रतिमास की दर से अवकाश पूर्ण दिन के आधार पर जमा किया जाता है। इसी प्रकार मृत्यु सहित किसी भी कारण से सेवा से मुक्त होने वाली छःमाही में सेवा में रहने के दिनांक तक की गई सेवा के प्रत्येक पूर्ण कैलेण्डर मास के लिए 2-1/2 (ढाई दिन) दिन प्रतिमास की दर से पूरे दिन के आधार पर अवकाश देय होता है।
  5. जब किसी छःमाही में असाधारण अवकाश का उपभोग किया जाता है तो संबंधित सरकारी सेवक के अवकाश लेखे में अगली छःमाही के लिए जमा किये जाने वाला अर्जित अवकाश असाधारण अवकाश की अवधि के 1/10 की दर से 15 दिन की अधिकतम सीमा के अधीन रहते हुए (पूरे दिन के आधार पर) कम कर दिया जाता है। शासकीय ज्ञाप संख्या-सा-4-1071 एवं 1072/दस-1992-201/76 दिनांक 21दिसम्बर 1992 मूल नियम 81 ख (1) एवं सहायक नियम 157-क (1)

अवकाश लेखा- अर्जित अवकाश के संबंध में सरकारी सेवकों के अवकाश लेखे प्रपत्र-11 घ में रखे जायेंगें। मूल नियम-81 ख (1) (8)

अर्जित अवकाश की एक बार में स्वीकृत करने की अधिकतम सीमा

यदि सम्पूर्ण अवकाश भारत में व्यतीत किया जा रहा हो –         120 दिन

यदि सम्पूर्ण अवकाश भारत के बाहर व्यतीत किया जा रहा हो -180 दिन (मूल नियम- 81 ख(दस) सहायक नियम 157(क)(1) (ग्यारह)

अवकाश वेतन- अवकाश काल में सरकारी सेवक को अवकाश पर प्रस्थान के ठीक पहले प्राप्त होने वाले वेतन के बराबर अवकाश वेतन ग्राह्य होता है।

मूल नियम- 87-क (1) तथा सहायक नियम 157-क(6)(क) शासनादेश संख्या-सा-4- 1395 / दस -88-200-76 दिनांक 13-10-1988 द्वारा प्रतिस्थापित तथा दिनांक 1-4-1978 से प्रभावी.

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2- चिकित्सा प्रमाण-पत्र पर अवका

(Leave on Medical Certificate):-

स्थायी सेवक के संबंध मे नियम

  1. सम्पूर्ण सेवाकाल में 12 माह तक का चिकित्सा प्रमाणपत्र पर अवकाश नियमों द्वारा निर्दिष्ट चिकित्सकों द्वारा प्रदान किये गये चिकित्सा प्रमाण पत्र पर स्वीकार किया जा सकता है
  2. उपरोक्त 12 माह का अवकाश समाप्त होने के उपरान्त आपवादिक मामलों में चिकित्सा परिषद की संस्तुति पर सम्पूर्ण सेवाकाल में कुल मिलाकर 6 माह का चिकित्सा प्रमाण पत्र पर अवकाश और स्वीकार किया जा सकता है। मूल नियम 81-ख (2)

अस्थायी सेवक के संबंध मे नियम

  1. ऐसे अस्थायी सेवकों को जो तीन वर्ष अथवा उससे अधिक समय से निरन्तर कार्यरत रहे हों तथा नियमित नियुक्ति और अच्छे आचरण आदि शर्तो को पूरा करते हों स्थायी सरकारी सेवकों के ही समान 12 महीने तक चिकित्सा प्रमाण पत्र पर अवकाश की सुविधा है, परन्तु 12 माह के उपरान्त स्थायी सेवकों को प्रदान किया जा सकने वाला 6 माह का अतिरिक्त अवकाश इन्हें अनुमन्य नहीं है।
  2. शेष सभी अस्थायी सेवकों को चिकित्सा प्रमाण पत्र के आधार पर सम्पूर्ण अस्थायी सेवाकाल में चार माह तक अवकाश प्रदान किया जा सकता है।
  3. प्राधिकृत चिकित्सा प्राधिकारी की संस्तुति पर सक्षम अधिकारी द्वारा साठ दिन तक की छुट्टी स्वीकृत की जा सकती है। इस अवधि से अधिक छुट्टी तब तक स्वीकृत नहीं की जा सकती, जब तक सक्षम अधिकारी को यह समाधान न हो जाये कि आवेदित छुट्टी की समाप्ति पर सरकारी कर्मचारी के कार्य पर वापस आने योग्य हो जाने की समुचित सम्भावना है। यदि सरकारी कर्मचारी की बीमारी के उपचार के मध्य मृत्यु हो जाती है तो उसे सक्षम अधिकारी चिकित्सा अवकाश स्वीकृत करेगा यदि चिकित्सा अवकाश अन्यथा देय है। मूल नियम-81-ख(2)(2), सहायक नियम-87

चिकित्सा अवकाश में वेतन

1-     स्थायी सेवकों तथा तीन वर्षो से निरन्तर कार्यरत अस्थायी सेवकों को 12 माह तक की अवधि तथा शेष अस्थायी सेवकों को चार माह तक की अवकाश अवधि के लिये वह अवकाश वेतन अनुमन्य होगा, जो उसे अर्जित अवकाश का उपभोग करने की दशा में अवकाश वेतन के रुप में देय होता।

2-     स्थायी सेवकों को 12 माह का अवकाश समाप्त होने के उपरान्त देय अवकाश के लिये अवकाश की दशा में अनुमन्य अवकाश वेतन की आधी धनराशि अवकाश वेतन के रुप में अनुमन्य होती है। मूल नियम 87-क (2) शासकीय ज्ञाप संख्या-सा-4-1071/दस-1992-2001/76 दिनांक 21 दिसम्बर 1992

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Leave Rules-अवकाश नियम

3- मातृत्व (प्रसूति) अवकाश (Maternity Leave)

प्रसूति अवकाश स्थायी अथवा अस्थायी महिला सरकारी सेवकों को निम्न दो अवसरों पर प्रत्येक के सम्मुख अंकित अवधि के लिए निर्धारित शर्तो के अधीन प्रदान किया जाता है।

1- प्रसूति के मामलों मे

प्रसूतावस्था पर अवकाश प्रारम्भ होने के दिनांक से 180 दिन (6 माह) तक। दो बच्चों में न्यूनतम 2 वर्ष का अंतर आवश्यक है; तभी दोबारा प्रसूति अवकाश स्वीकृत किया जा सकता है। यदि किसी महिला सरकारी सेवक के दो या अधिक जीवित बच्चें हो तो उसे प्रसूति अवकाश स्वीकृत नहीं किया जा सकता, भले ही उसे अवकाश अन्यथा देय हो। किसी बच्चे के असाध्य रोग से पीड़ित होने या आनुवंशिक रूप से पीड़ित होने की दशा में चिकित्सकीय प्रमाण पत्र के आधार पर सम्पूर्ण सेवा में 3 बार स्वीकृत किया जा सकता है।

2- गर्भपात के मामले में

  1. गर्भपात के मामलों में, जिसके अन्तर्गत गर्भश्राव भी है, प्रत्येक अवसर पर 6 सप्ताह तक। अवकाश के प्रार्थना पत्र के समर्थन में प्राधिकृत चिकित्सक का प्रमाण पत्र संलग्न किया गया हो। मूल नियम 101 एवं सहायक नियम 153 शासनादेश सं0ः जी-4-394-दस-216-79, दिनांक 4 जून 1990
  2. प्रसूति अवकाश को किसी प्रकार के अवकाश लेखे में नहीं घटाया जाता है तथा अन्य प्रकार की छुट्टी के साथ मिलाया जा सकता है। सहायक नियम 156
  3. प्रसूति अवकाश की अवधि में अवकाश वेतन पूर्ण वेतन पर अनुमन्य होता है।     सहायक नियम 153

महिला सरकारी सेवकों को बाल्य देखभाल अवकाष (Child Care Leave) की अनुमन्यता:-

  1. महिला सरकारी सेवक को सम्पूर्ण सेवाकाल में अधिकतम 730 (2 वर्ष) दिनों का बाल्य देखभाल अवकाश प्रसूति अवकाश की शर्तों एवं प्रतिबन्धों के अधीन अनुमन्य होगा।
  2. विशिष्ट परिस्थितियों यथा बीमारी तथा परीक्षा आदि में देखभाल हेतु संतान की 18 वर्ष की आयु होने की अवधि तक देय है।
  3. गोद ली गयी संतान के सम्बन्ध में भी यह अवकाश देय होगा।
  4. सम्बन्धित महिला कर्मचारी के अवकाश लेखे में उपार्जित अवकाश देय होते हुए भी बाल्य देखभाल अवकाश अनुमन्य होगा।
  5. बाल्य देखभाल अवकाश को एक कलैण्डर वर्ष के दौरान तीन बार से अधिक नहीं दिया जायेगा।
  6. बाल्य देखभाल अवकाश को 15 दिनों से कम के लिये नहीं दिया जायेगा।
  7. बाल्य देखभाल अवकाश को साधारणतया परिवीक्षा अवधि के दौरान नहीं दिया जायेगा, ऐसे मामलों को छोड़कर जहाँ अवकाश देने वाला प्राधिकारी परिवीक्षार्थी की बाल्य देखभाल अवकाश की आवश्यकता के बारे में पूर्ण रुप से संतुष्ट न हो। इसे भी सुनिश्चित किया जायेगा कि परिवीक्षा अवधि के दौरान अवकाश दिया जा रहा है तो इस अवकाश की अवधि कम-से-कम हो।
  8. बाल्य देखभाल अवकाश को अर्जित अवकाश के समान माना जायेगा और उसी प्रकार से स्वीकृत किया जायेगा।
  9. यदि किसी महिला कर्मचारी द्वारा दिनांक 08-12-2008 के कार्यालय-ज्ञाप (उत्तराखंड राज्य के संबंध में) के जारी होने के पश्चात्, बाल्य देखभाल के प्रयोजन हेतु अर्जित अवकाश लिया गया है तो उसके अनुरोध पर उक्त अर्जित अवकाश को बाल्य देखभाल अवकाश में समायोजित किया जा सकेगा।

उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड राज्य के लिए शासनादेश- (कार्यालय ज्ञाप संख्या-जी-2-2017/दस-2008-216-79, दिनांक 08-12-2008, कार्यालय ज्ञाप संख्या- जी-2-573/दस-2009-216-79, दिनांक 24-3-2009 तथा शासनादेश संख्या- जी-2-176/दस-2011- 216-79 दिनांक 11 अप्रैल, 2011)

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Leave Rules-अवकाश नियम

4- अध्ययन अवकाश (Study Leave)

  1. स्थायी सरकारी सेवकों को जनहित में किन्हीं वैज्ञानिक, प्राविधिक अथवा इसी प्रकार की समस्याओं के अध्ययन या विशेष पाठ्यक्रम को पूरा करने के लिए निर्धारित शर्तो के अधीन अध्ययन अवकाश दिया जा सकता है।
  2. यह अवकाश भारत में अथवा भारत के बाहर अध्ययन करने के लिए स्वीकृत किया जा सकता है। जिन सरकारी सेवकों ने पाँच वर्ष से कम सेवा की हो अथवा जिन्हें सेवानिवृत्ति होने का विकल्प तीन या उससे कम समय में अनुमन्य हो, उनको अध्ययन अवकाश साधारणतया प्रदान नहीं किया जाता है।
  3. असाधारण अवकाश या चिकित्सा प्रमाणपत्र पर अवकाश को छोड़कर अन्य प्रकार के अवकाश को अध्ययन अवकाश के साथ मिलाये जाने की दशा में सकल अवकाश अवधि के परिणामस्वरुप संबंधित सरकारी सेवक की अपनी नियमित ड्यूटी से अनुपस्थिति 28 महीने से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  4. एक बार में बारह माह के अवकाश को साधारणतया उचित अधिकतम सीमा माना जाना चाहिए तथा केवल साधारण कारणों को छोड़कर इससे अधिक अवकाश किसी एक समय में नहीं दिया जाना चाहिए।
  5. सम्पूर्ण सेवा अवधि में कुल मिलाकर 2 वर्ष तक का अध्ययन अवकाश प्रदान किया जा सकता है।

अध्ययन अवकाश में अवकाश वेतन- अध्ययन अवकाश काल में अर्धवेतन अनुमन्य होता है. (मूल नियम 84 एवं सहायक नियम 146क)

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Leave Rules-अवकाश नियम

5- असाधारण अवकाश (Extra Ordinary Leave)

  1. असाधारण अवकाश निम्न विषेष परिस्थितियों में स्वीकृत किया जा सकता है – जब अवकाश नियमों के अधीन कोई अन्य अवकाश देय न हो। अन्य अवकाश देय होने पर भी संबंधित सरकारी सेवक असाधारण अवकाश प्रदान करने के लिए आवेदन करे। यह अवकाश लेखे से नहीं घटाया जाता है। मूल नियम 85
  2. स्थायी सरकारी सेवक को असाधारण अवकाश किसी एक समय में मूल नियम 18 के उपबन्धों के अधीन अधिकतम 5 वर्ष तक की अवधि के लिए स्वीकृत किया जा सकता है। किसी भी अन्य प्रकार के अवकाश के क्रम में स्वीकृत किया जा सकता है।                         मूल नियम 81-ख (6)
  3. अस्थायी सरकारी सेवक को देय असाधारण अवकाश की अवधि किसी एक समय में निम्नलिखित सीमाओं से अधिक न होगी-                             सहायक नियम 157क (4)
    1. 3 मास।
    2. या 6 मास यदि संबंधित सरकारी सेवक ने तीन वर्ष की निरन्तर सेवा अवकाश अवधि सहित पूरी कर ली हो तथा अवकाश के समर्थन में नियमों के अधीन अपेक्षित चिकित्सा प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया हो।
    3. या 18 मास- यदि संबंधित सरकारी सेवक ने एक वर्ष की निरन्तर सेवा पूरी कर ली हो, और वह गंभीर रोग का उपचार करा रहा हो।
    4. या अधिकतम 24 मास- सम्पूर्ण अस्थायी सेवा की अवधि में 24 मास की अधिकतम सीमा के अधीन रहते हुए जनहित में भारत अथवा विदेश में अध्ययन करने के लिए इस प्रतिबन्ध के अधीन देय है कि संबंधित सेवक ने तीन वर्ष की निरन्तर सेवा पूरी कर ली है।
  4. असाधारण अवकाश की अवधि के लिए कोई अवकाश वेतन देय नहीं है।

    मूल नियम 85, 87(क) (4) एवं सहायक नियम 157क(6) (ग)।

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Leave Rules-अवकाश नियम 6- चिकित्सालय अवकाश
(Hospital Leave)

चिकित्सक के प्रमाण पत्र पर अवकाश के अलावा मूल नियमों में चिकित्सालय अवकाश की व्यवस्था भी है; जिस विषय में सामान्यत कार्मिकों को जानकारी कम होती है। जो निम्नलिखित परिस्थितियों में दिया जा सकता है:-

  1. अधीनस्थ सेवाओं के कर्मचारियों को, जिनकी डयूटी में दुर्घटना या बीमारी का विशेष खतरा हो, अस्वस्थता के कारण अवकाश प्रदान किया जा सकता है।                     मूल नियम 101
  2. चिकित्सालय अवकाश नियुक्ति प्राधिकारी के द्वारा प्रदान किया जा सकता है।
  3. समस्त स्थायी अथवा अस्थायी सरकारी सेवकों, जिन्हें अपने कर्तव्यों के कारण खतरनाक मशीनरी, विस्फोटक पदार्थ, जहरीली गैसों अथवा ओैषधियों आदि से काम करना पड़ता है अथवा जिन्हें अपने कर्तव्यों, जिनका उल्लेख सहायक नियम 155 के उप नियम (5) में है के कारण दुर्घटना अथवा बीमारी का विशेष जोखिम उठाना पड़ता है, को शासकीय कर्तव्यों के परिपालन के दौरान दुर्घटना या बीमारी से ग्रसित होने पर चिकित्सालय/औषधालय में भर्ती होने पर अथवा वाह्य रोगी के चिकित्सा कराने हेतु प्रदान किया जाता है।
  4. यह अवकाश चाहे एक बार में लिया जाये अथवा किश्तों में किसी भी दशा में तीन वर्ष की कालावधि में छः माह से अधिक स्वीकृत नहीं की जायेगी।                     सहायक नियम 155A
  5. चिकित्सालय अवकाश को अवकाश लेखे से नहीं घटाया जाता है तथा इसे अन्य देय अवकाश से संयोजित किया जा सकता है, परन्तु शर्त यह है कि कुल मिलाकर अवकाश अवधि 28 माह से अधिक नहीं होगी। सहायक नियम 156
  6. अवकाश वेतन- चिकित्सालय अवकाश अवधि के पहले तीन माह तक के लिए पूर्ण वेतन पर अवकाश वेतन प्राप्त होता है। तीन माह से अधिक की शेष अवधि के लिये गये अवकाश वेतन अर्द्ध वेतन के हिसाब से दिया जाता है।सहायक नियम 155 (3)

 

7- निजी कार्य पर अवकाश (Leave on private affairs)

निजी कार्य पर अवकाश अर्जित अवकाश की ही भांति तथा उसके लिये निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रत्येक कैलेण्डर वर्ष के लिए 31 दिन 2 छःमाही किश्तों में जमा किया जाता है। इसमें सम्पूर्ण प्रक्रिया वही है जो अर्जित अवकाश के विषय में है। इसका लेखा भी अर्जित अवकाश की भांति रखा जाता है। सामान्यत कार्मिक इसका उपभोग नहीं करते हैं क्योंकि यह अर्धवेतन पर स्वीकृत किया जाता है।

अधिकतम अवकाश अवधि तथा देय अवकाश

स्थायी सरकारी सेवक के संबंध में-

1-     यह अवकाश 365 दिन तक की अधिकतम सीमा के अधीन जमा किया जाता है

2-     सम्पूर्ण सेवाकाल में कुल मिलाकर 365 दिन तक का ही अवकाश स्वीकृत किया जा सकता है।

3-     किसी एक समय में स्वीकृत की जा सकने योग्य अधिकतम सीमा निम्नानुसार –

पूरा अवकाश भारत में व्यतीत किये जाने पर               – 90 दिन

पूरा अवकाश भारत से बाहर व्यतीत किये जाने पर      – 180 दिन

मूल नियम 81-ख (3) शासकीय ज्ञाप संख्या-सा-4-1071/ दस-1992 -2001 /76 दिनांक 21 दिसम्बर 1992

अस्थायी सरकारी सेवक के संबंध में-

  1. सम्पूर्ण अस्थायी सेवाकाल में कुल मिलाकर 120 दिन तक का अवकाश प्रदान किया जा सकता है। अस्थायी सेवकों को निजी कार्य पर अवकाश तब तक स्वीकार नहीं होता जब तक कि उनके द्वारा दो वर्ष की निरन्तर सेवा पूरी न कर ली गयी हो।
  2. अस्थायी सरकारी सेवकों के अवकाष खातों में निजी कार्य पर अवकाश किसी अवसर पर 60 दिन से अधिक जमा नहीं होगा ।
  3. किसी सरकारी सेवक को एक बार में निजी कार्य पर अवकाश स्वीकृत किये जाने की अधिकतम अवधि साठ दिन होगी ।
  4. अवकाष स्वीकृति आदेश में अतिशेष अवकाश इंगित किया जायेगा।

    सहायक नियम 157-क (3) शासकीय ज्ञाप संख्या-सा-4-1072 /दस- 1992-2001 /76 दिनांक 21 दिसम्बर 1992 (उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड राज्य हेतु)

अवकाश लेखा- निजी कार्य पर अवकाश के संबंध में सरकारी सेवकों के अवकाश लेखे प्रपत्र 11-ड; में रखे जायेंगे। सहायक नियम- 157-क(3)(दस)

अवकाश वेतन- निजी कार्य पर अवकाश काल में वह अवकाश वेतन मिलता है जो अर्जित अवकाश के लिए अनमन्य होने वाले अवकाश वेतन की धनराशि के आधे के बराबर हो। मूल नियम 87-क (2) तथा सहायक नियम 157-क(6) (ख)

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8- विशेष विकलांगता अवकाश (Special Disability Leave)

  1. राज्यपाल किसी ऐसे स्थायी अथवा अस्थायी सरकारी सेवक को जो किसी के द्वारा जानबूझ कर चोट पहुँचाने के फलस्वरुप अथवा अपने सरकारी कर्तव्यों के उचित पालन में या उसके फलस्वरुप चोट लग जाने अथवा अपनी अधिकारीय स्थिति के परिणाम स्वरुप चोट लग जाने के कारण अस्थायी रुप में विकलांग हो गया हो, को विशेष विकलांगता अवकाश प्रदान कर सकते हैं।
  2. अवकाश तभी स्वीकृत किया जा सकता है जबकि विकलांगता, उक्त घटना के दिनांक से तीन माह के अन्दर प्रकट हो गई हो तथा संबंधित सेवक ने उसकी सूचना तत्परता से यथा सम्भव शीघ्र दे दी हो। राज्यपाल विकलांगता के बारे में संतुष्ट होने की दशा में घटना के तीन माह के पश्चात प्रकट हुई विकलांगता के लिए भी अवकाश प्रदान कर सकते है।
  3. किसी एक घटना के लिए एक बार से अधिक बार भी अवकाश प्रदान किया जा सकता है। विकलांगता बढ़ जाये अथवा भविष्य में पुनः वैसी ही परिस्थितियाँ प्रकट हो जाय तो अवकाश ऐसे अवसरों पर एक से अधिक बार भी प्रदान किया जा सकता है।
  4. अवकाश चिकित्सा परिषद द्वारा दिये गये चिकित्सा प्रमाणपत्र के आधार पर प्रदान किया जा सकता है तथा अवकाश की अवधि चिकित्सा परिषद द्वारा की गयी संस्तुति पर निर्भर रहती है, परन्तु यह चौबीस महीने से अधिक नहीं होगी।
  5. अवकाश वेतन- चार महीने पूर्ण औसत वेतन तथा शेष अवधि में अर्द्ध औसत वेतन।    मूल नियम 83 तथा 83 क

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Leave Rules-अवकाश नियम

9- लघुकृत अवकाश (Commuted Leave)

  1. लघुकृत अवकाश अलग से कोई अवकाश नहीं है। मूल नियम 84 के अधीन उच्चतर वैज्ञानिक या प्राविधिक अर्हताएँ प्राप्त करने के लिए अध्ययन अवकाश पर जाने वाले स्थायी सरकारी सेवकों के विकल्प पर उनको निजी कार्य पर अवकाश स्वीकृत किये जाने योग्य जमा कुल अवकाश का आधा अवकाश लघुकृत अवकाश के रूप में स्वीकृत किया जा सकता है।
  2. जितनी अवधि के लिये लघुकृत अवकाश स्वीकृत किया जाता है उसकी दुगुनी अवधि उसके निजी कार्य पर अवकाश खाते में जमा अवकाश में से घटा दी जाती है। किसी एक बार स्वीकृत किये जाने वाले अवकाश की अधिकतम अवधि निजी कार्य पर अवकाश की स्वीकृत हेतु निर्धारित अधिकतम अवकाश के आधे के बराबर है।
  3. यह अवकाश तभी स्वीकृत किया जायेगा जब स्वीकर्ता अधिकारी को यह समाधान हो जाये कि अवकाश समाप्ति पर सरकारी कर्मचारी सेवा में वापस आयेगा।
  4. यह अवकाश एशिया में 45 दिन तथा एशिया के बाहर 90 दिन तक एक बार में स्वीकृत किया जा सकेगा। मूल नियम 81-ख (4)
  5. अर्जित अवकाश की तरह अवकाश पर जाने से ठीक पहले प्राप्त वेतन, अवकाश वेतन के रूप में अनुमन्य है। मूल नियम 87-क(4)

How Pay Fixation In 6th Pay Commission

How PAY FIXATION In 6TH PAY COMMISSION

 6TH PAY COMMISSION की संस्तुतियों पर केन्द्र सरकार द्वारा वेतनमान के सम्बन्ध में  लिये गये निर्णय के आधार पर राज्य सरकारों द्वारा प्रदेश सरकारों के विभिन्न शासकीय कर्मचारियों के वेतनमानों के पुनरीक्षण हेतु वेतन समिति का गठन किया गया। उक्त समितियों के प्रतिवेदनो में की गई संस्तुतियों को विचारोपरान्त कतिपय संशोधनों के साथ स्वीकार कर लिया गया।

छठे वेतनमान की कुछ विशेषताएं- 

  1. वार्षिक वेतन वृद्धि माह जनवरी और माह जुलाई नियत होगी।
  2. 01 जनवरी से 30 जून तक के बीच की अवधि के लिए वेतन वृद्धि की तिथि माह जनवरी रहेगी।
  3. 01 जुलाई से 31 दिसंबर तक के बीच की अवधि के लिए वेतन वृद्धि की तिथि माह जुलाई रहेगी।
  4. वेतनवृद्धि की आगणित राशि मूल वेतन और ग्रेड वेतन के योग का 3% होगी।

PAY FIXATION 6TH PAY EXAMPLE- 9300+4200= 13500x 3/100= 405 (10 के गुणांक में 410) वेतनवृद्धि के बाद वेतन 9300+410+4200= 13910

संशोधित वेतन ढाँचे में पदोन्नति अब दो प्रकार से सम्भव हो सकती है-

A – एक ही वेतन बैंड के अन्दर एक ग्रेड वेतन से दूसरे ग्रेड वेतन में पदोन्नति ।

B – एक वेतन बैंड से दूसरे वेतन बैंड में पदोन्नति.

दिनांक 01 जनवरी 2006 को या उसके पश्चात संशोधित वेतन ढांचे में एक ग्रेड पे से दूसरे ग्रेड पे में पदोन्नति की स्थिति में PAY FIXATION निम्नानुसार किया जायेगा।

वेतन बैंड में वेतन में अनुमन्य ग्रेड वेतन जोड़ कर इसके 03 प्रतिशत की धनराशि को 10 के अगले गुणांक में पूर्णाकित किया जायेगा। इस धनराशि को वेतन बैंड में मौजूदा वेतन में जोड़ दिया जायेगा। इसके बाद वेतन बैंड में इसके अतिरिक्त पदोन्नत पद के समकक्ष ग्रेड वेतन में वेतन प्रदान किया जायेगा। जहां पदोन्नति में वेतन बैंड में परिवर्तन भी हो ऐसी स्थिति में इसी प्रविधान के अनुसार कार्यवाही की जाएगी तथापि प्रोन्नति के ठीक पूर्व प्राप्त वेतन वृद्धि जोड़ने के बाद जहां वेतन बैंड में  वेतन पदोन्नति वाले पद के उच्च वेतन बैंड के न्यूनतम से काम होगा तो इस वेतन को उक्त वेतन बैंड में न्यूनतम के बराबर बढ़ा दिया जाएगा।

PAY FIXATION 6TH PAY COMMISSION में वेतन निर्धारण का उदाहरण-

राम की 10 वर्ष की सेवा दिनांक 04-04-2012 को पूर्ण होती है। तत्समय उसका वेतन बैंड ₹15000 तथा ग्रेड वेतन ₹4,200 है। उसकी वार्षिक वेतन वृद्धि की तिथि 1 july 2012 को है। दिनांक 04-04-2012  को उसे प्रथम ए.सी.पी. 4,600 स्वीकृत किया जाता है। राम का प्रथम पदोन्नत पद ग्रेड वेतन 4800 है। इस सूचना के आधार पर उसका निम्नानुसार वेतन निर्धारण करें-

  1. एसीपी की स्वीकृति तिथि दिनांक 04-04—2012 को वेतन निर्धारण करें?
  2. कार्मिक के विकल्प के अनुसार आगामी वेतन वृद्धि की तिथि 01-07-2012 को वेतन निर्धारण करें?  
  3. दिनांक 01-11-2013 को उत्तराखंड राज्य में शासनादेश संख्या-770 दि0- 06-11-2013 के अनुसार  पदोन्नति के पद का ग्रेड वेतन स्वीकृत होने पर वेतन निर्धारण करें?

उत्तर -1- एसीपी स्वीकृति तिथि को आहरित वेतन- ₹15000+4200= 19200

एसीपी स्वीकृति पर देय ग्रेड वेतन – ₹ 4600

वेतन निर्धारण- (निम्न वेतनस्तर पर एक वेतनवृद्धि देय होगी)

19200*3/100=576 (10 के गुणांक में 580)  15000+580+4600=20180 (आगामी वेतनवृद्धि 1 जनवरी 2013)

2- कार्मिक के विकल्प के अनुसार आगामी वेतन वृद्धि की तिथि 01-07-2012 को वेतन निर्धारण-

एसीपी की तिथि 04-04-2012 को मूल वेतन के साथ बढ़ा हुआ ग्रेड वेतन जुड़ जाएगा। 15000+4600=19600

ब- विकल्प की तिथि दिनांक 01-07-12 को निम्न वेतनस्तर पर 3% वेतनवृद्धि दो बार देय होगी। एक बार पदोन्नति के रूप में और दूसरी वार्षिक वेतनवृद्धि के रूप में।

15000+580+600+4600= 20780   (आगामी वेतनवृद्धि 1 जनवरी 2013)

3- दिनांक 01-11-2013 को उत्तराखंड राज्य में शासनादेश संख्या-770 दि0- 06-11-2013 के अनुसार  पदोन्नति के पद का ग्रेड वेतन स्वीकृत होने पर वेतन निर्धारण-

वेतन- 16180+4600=20780. पदोन्नति के पद का ग्रेड वेतन- 4800 पर वेतन-16180+4800=20980.

नोट- जिस प्रकार पदोन्नति पर वेतन वृद्धि की तिथि मे परिवर्तन होता है उसी प्रकार वेतन उच्चीकरण की दशा में भी आगामी वेतनवृद्धि की तिथि में परिवर्तन होता है। इस प्रकार इस प्रकरण में आगामी वेतनवृद्धि की तिथि 01 जुलाई 2014 हो जाएगी।